एकीकृत जलग्रहण क्षेत्र प्रबंधन कार्यक्रम (आर्इ.डब्ल्यू.एम.पी.)

राज्य के लिए वाटरशेड परियोजनाओं का बहुत ही महत्व है, खास कर राज्य के उŸारी एवं दक्षिणी भागों में जहां कृषि योग्य भूमि का अधिकांश हिस्सा वर्षा आधारित है। वर्षा आधारित क्षेत्रों में बढ़ती गरीबी, पेयजल की कमी, भू-जल स्तर में तेजी से गिरावट, कृषि व भूमि की उत्पादकता, वर्षा जल के उपयोग की कम क्षमता, चारे की अत्यधिक कमी, पशुघन से अत्यंत कम उत्पादन, जल उपयोग की क्षमता में कम निवेश, सुनिशिचत और लाभकारी व्यवसायिक अवसरों की कमी इत्यादि गंभीर समस्याओं से ग्रस्त राज्य के गरीब ग्रामीणों के लिए वाटरशेड की योजनाएं उपयुक्त है। इनके माध्यम से वर्षा सिंचित क्षेत्रों में सतत आधार पर आय, उत्पादकता को बढ़ाने तथा कृषि प्रणालियों को छोटी-छोटी जल संरक्षण के लिए निर्मित संरचनाओं के माध्यम से सिंचार्इ सुविधा उपलब्ध कराने एवं गरीबों के लिए आय के अन्य साधन जुटाने का प्रयास किये जा रहे है। परियोजना के अंतर्गत विभिन्न कार्यो में निम्नानुसार व्यय के प्रावधान है .

बजट संघटक. बजट का प्रतिशतता
प्रशासनिक लागत
-मानीटरिंग (निगरानी)
-मूल्यांकन
10
1
1
प्रारंभिक चरण निम्नलिखित सहित
-प्रांरभिक कार्यकलाप (आस्थामूलक कार्य)
-संस्थापन तथा क्षमता निर्माण
-विस्तृत परियोजना रिपोर्ट (डीपीआर)

4

5


1
वाटरशेड कार्य चरण
-वाटरशेड विकास कार्य
-गरीबी रेखा से नीचे के (बी.पी.एल.) तथा भूमिहीन व्यकितयों के लिए आजीविका संबंधी कार्यकलाप
-उत्पादन प्रणाली तथा अति लघु (माइक्रो) उधम
56

9

10
समेकन चरण 3
योग 100

IWMP की एक परियोजना (मिलीवाटरशेड) का उपचार योग्य क्षेत्रफल लगभग 5000 हेक्टेयर के आसपास होता है। परियोजनाओं की लागत, सामान्य जिलों में 12,000- रू. प्रति हेक्टेयर और IAP जिलों में 15,000- प्रति हेक्टेयर की दर से भारत सरकार, भूमि संसाधन विभाग द्वारा निर्धारित की गर्इ है। परियोजना मद में होने वाले व्यय का 90% भाग केन्द्र सरकार एवं 10% भाग राज्य सरकार द्वारा वहन किया जाता है। परियोजनाओं की पूर्णत: अवधि 4 से 7 वर्ष तक होती है।